হাদিস নং: ১৩৭৫
সহিহ (Sahih)
حدثنا محمد بن المثنى حدثنا يحيى حدثنا شعبة قال حدثني عون بن ابي جحيفة عن ابيه عن البراء بن عازب عن ابي ايوب قال خرج النبي صلى الله عليه وسلم وقد وجبت الشمس فسمع صوتا فقال يهود تعذب في قبورها وقال النضر اخبرنا شعبة حدثنا عون سمعت ابي سمعت البراء عن ابي ايوب عن النبي صلى الله عليه وسلم
১৩৭৫. আবূ আইয়ুব [আনসারী (রা.)] হতে বর্ণিত। তিনি বলেন, (একবার) সূর্য ডুবে যাওয়ার পর নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বের হলেন। তখন তিনি একটি আওয়াজ শুনতে পেয়ে বলেনঃ ইয়াহূদীদের কবরে আযাব দেয়া হচ্ছে। (এটা আযাব দেয়ার বা আযাবের ফেরেশ্তাগণের বা ইয়াহূদীদের আওয়ায।) [ইমাম বুখারী (রহ.) বলেন] নযর (রহ.).....আবূ আইয়ুব (রাঃ) সূত্রে নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হতে (অনুরূপ) বলেছেন। (মুসলিম ৫১/১৭, হাঃ ২৮৬৯) (আধুনিক প্রকাশনীঃ ১২৮৪, ইসলামিক ফাউন্ডেশনঃ ১২৯২)
হাদিস নং: ১৩৭৬
সহিহ (Sahih)
حدثنا معلى حدثنا وهيب عن موسى بن عقبة قال حدثتني ابنة خالد بن سعيد بن العاص انها سمعت النبي صلى الله عليه وسلم وهو يتعوذ من عذاب القبر
১৩৭৬. খালিদ ইবনু সাঈদ ইবনু ‘আস (রাঃ) হতে বর্ণিত। তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম-কে কবরের শাস্তি হতে আশ্রয় প্রার্থনা করতে শুনেছেন। (৬৩৬৪) (আধুনিক প্রকাশনীঃ ১২৮৫, ইসলামিক ফাউন্ডেশনঃ ১২৯৩)
হাদিস নং: ১৩৭৭
সহিহ (Sahih)
حدثنا مسلم بن ابراهيم حدثنا هشام حدثنا يحيى عن ابي سلمة عن ابي هريرة قال كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يدعو ويقول اللهم اني اعوذ بك من عذاب القبر ومن عذاب النار ومن فتنة المحيا والممات ومن فتنة المسيح الدجال
১৩৭৭. আবূ হুরাইরাহ্ (রাঃ) হতে বর্ণিত। তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দু‘আ করতেন, হে আল্লাহ্! আমি আপনার সমীপে পানাহ চাচ্ছি কবরের শাস্তি হতে, জাহান্নামের শাস্তি হতে, জীবন ও মরণের ফিতনা হতে এবং মাসীহ্ দাজ্জাল এর ফিতনা হতে। (মুসলিম ৫/২৫, হাঃ ৫৮৮, আহমাদ ৯৪৭০) (আধুনিক প্রকাশনীঃ ১২৮৬, ইসলামিক ফাউন্ডেশনঃ ১২৯৪)
হাদিস নং: ১৩৭৮
সহিহ (Sahih)
. حدثنا قتيبة حدثنا جرير عن الاعمش عن مجاهد عن طاوس عن ابن عباس مر النبي صلى الله عليه وسلم على قبرين فقال انهما ليعذبان وما يعذبان من كبير ثم قال بلى اما احدهما فكان يسعى بالنميمة واما احدهما فكان لا يستتر من بوله قال ثم اخذ عودا رطبا فكسره باثنتين ثم غرز كل واحد منهما على قبر ثم قال لعله يخفف عنهما ما لم ييبسا
১৩৭৮. ইবনু ‘আব্বাস (রাঃ) হতে বর্ণিত। তিনি বলেন, (একবার) নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম দু’টি কবরের পাশ দিয়ে যাচ্ছিলেন। তখন তিনি বললেন ঐ দু’জনকে আযাব দেয়া হচ্ছে আর কোন কঠিন কাজের কারণে তাদের আযাব দেয়া হচ্ছে না। অতঃপর তিনি সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেনঃ হাঁ (আযাব দেয়া হচ্ছে) তবে তাদের একজন পরনিন্দা করে বেড়াত, অন্যজন তার পেশাবের ব্যাপারে সতর্কতা অবলম্বন করত না। (রাবী বলেন) অতঃপর তিনি একটি তাজা ডাল নিয়ে তা দু’খন্ডে ভেঙ্গে ফেললেন। অতঃপর সে দু’ খন্ডের প্রতিটি এক এক কবরে পুঁতে দিলেন। অতঃপর বললেনঃ আশা করা যায় যে এ দু’টি শুকিয়ে না যাওয়া পর্যন্ত তাদের উভয়ের ‘আযাব হালকা করা হবে। (২১৬) (আধুনিক প্রকাশনীঃ ১২৮৭, ইসলামিক ফাউন্ডেশনঃ ১২৯৫)
হাদিস নং: ১৩৭৯
সহিহ (Sahih)
حدثنا اسماعيل قال حدثني مالك عن نافع عن عبد الله بن عمر ان رسول الله صلى الله عليه وسلم قال ان احدكم اذا مات عرض عليه مقعده بالغداة والعشي ان كان من اهل الجنة فمن اهل الجنة وان كان من اهل النار فمن اهل النار فيقال هذا مقعدك حتى يبعثك الله يوم القيامة
১৩৭৯. ‘আবদুল্লাহ্ ইবনু ‘উমার (রাঃ) হতে বর্ণিত যে, আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেনঃ তোমাদের কেউ মারা গেলে অবশ্যই তার সামনে সকাল ও সন্ধ্যায় তার অবস্থান স্থল উপস্থাপন করা হয়। যদি সে জান্নাতী হয়, তবে (অবস্থান স্থল) জান্নাতীদের মধ্যে দেখানো হয়। আর সে জাহান্নামী হলে, তাকে জাহান্নামীদের (অবস্থান স্থল দেখানো হয়) আর তাকে বলা হয়, এ হচ্ছে তোমার অবস্থান স্থল, ক্বিয়ামাত (কিয়ামত) দিবসে আল্লাহ্ তোমাকে পুনরুত্থিত করা অবধি। (৩২৪০, ৬৫১৫, মুসলিম ৫১/১৭, হাঃ ২৬৮৮, আহমাদ ৫১১৯) (আধুনিক প্রকাশনীঃ ১২৮৮, ইসলামিক ফাউন্ডেশনঃ ১২৯৬)
হাদিস নং: ১৩৮০
সহিহ (Sahih)
حدثنا قتيبة حدثنا الليث عن سعيد بن ابي سعيد عن ابيه انه سمع ابا سعيد الخدري يقول قال رسول الله صلى الله عليه وسلم اذا وضعت الجنازة فاحتملها الرجال على اعناقهم فان كانت صالحة قالت قدموني قدموني وان كانت غير صالحة قالت يا ويلها اين يذهبون بها يسمع صوتها كل شيء الا الانسان ولو سمعها الانسان لصعق
১৩৮০. আবূ সাঈদ খুদরী (রাঃ) হতে বর্ণিত। তিনি বলেন, আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেনঃ মৃত ব্যক্তিকে খাটিয়ায় রেখে লোকেরা যখন কাঁধে বহন করে নিয়ে যায় তখন সে নেক্কার হলে বলতে থাকে, আমাকে এগিয়ে নিয়ে চল, আমাকে এগিয়ে নিয়ে চল; আর সে নেক্কার না হলে বলতে থাকে হায় আফসোস! এটাকে নিয়ে তোমরা কোথায় যাচ্ছ? মানুষ ব্যতীত সব কিছুই তার এ আওয়াজ শুনতে পায়। মানুষেরা তা শুনতে পেলে অবশ্যই অজ্ঞান হয়ে পড়ত। (১৩১৪, আহমাদ ১১৩৭২, ১১৫৫২) (আধুনিক প্রকাশনীঃ ১২৮৯, ইসলামিক ফাউন্ডেশনঃ ১২৯৭)
হাদিস নং: ১৩৮১
সহিহ (Sahih)
حدثنا يعقوب بن ابراهيم حدثنا ابن علية حدثنا عبد العزيز بن صهيب عن انس بن مالك قال قال رسول الله صلى الله عليه وسلم ما من الناس مسلم يموت له ثلاثة من الولد لم يبلغوا الحنث الا ادخله الله الجنة بفضل رحمته اياهم
قَالَ أَبُو هُرَيْرَةَ t عَنْ النَّبِيِّ مَنْ مَاتَ لَهُ ثَلاَثَةٌ مِنْ الْوَلَدِ لَمْ يَبْلُغُوا الْحِنْثَ كَانَ لَهُ حِجَابًا مِنْ النَّارِ أَوْ دَخَلَ الْجَنَّةَ
আবূ হুরাইরাহ্ (রাঃ) নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হতে বর্ণনা করেন, যে ব্যক্তির এমন তিনটি সন্তান মারা যায় যারা বালিগ হয়নি, তারা (মাতা-পিতার জন্য) জাহান্নাম হতে আবরণ হয়ে যাবে। অথবা (তিনি বলেছেন) সে ব্যক্তি জান্নাতে প্রবেশ করবে।
১৩৮১. আনাস ইবনু মালিক (রাঃ) হতে বর্ণিত। তিনি বলেন, আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেনঃ যে কোন মুসলিম ব্যক্তির এমন তিনটি (সন্তান) মারা যাবে, যারা বালিগ হয়নি, আল্লাহ্ তাদের প্রতি তাঁর রহমতের ফযলে সে ব্যক্তিকে (মা-বাপকে) জান্নাতে প্রবেশ করাবেন। (১২৪৮) (আধুনিক প্রকাশনীঃ ১২৯০, ইসলামিক ফাউন্ডেশনঃ ১২৯৮)
আবূ হুরাইরাহ্ (রাঃ) নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম হতে বর্ণনা করেন, যে ব্যক্তির এমন তিনটি সন্তান মারা যায় যারা বালিগ হয়নি, তারা (মাতা-পিতার জন্য) জাহান্নাম হতে আবরণ হয়ে যাবে। অথবা (তিনি বলেছেন) সে ব্যক্তি জান্নাতে প্রবেশ করবে।
১৩৮১. আনাস ইবনু মালিক (রাঃ) হতে বর্ণিত। তিনি বলেন, আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেনঃ যে কোন মুসলিম ব্যক্তির এমন তিনটি (সন্তান) মারা যাবে, যারা বালিগ হয়নি, আল্লাহ্ তাদের প্রতি তাঁর রহমতের ফযলে সে ব্যক্তিকে (মা-বাপকে) জান্নাতে প্রবেশ করাবেন। (১২৪৮) (আধুনিক প্রকাশনীঃ ১২৯০, ইসলামিক ফাউন্ডেশনঃ ১২৯৮)
হাদিস নং: ১৩৮২
সহিহ (Sahih)
حدثنا ابو الوليد حدثنا شعبة عن عدي بن ثابت انه سمع البراء قال لما توفي ابراهيم عليه السلام قال رسول الله صلى الله عليه وسلم ان له مرضعا في الجنة
১৩৮২. বারাআ (রাঃ) হতে বর্ণিত। তিনি বলেন, (নবী তনয়) ইব্রাহীম (রাঃ)-এর মৃত্যু হলে, আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেনঃ তাঁর জন্য তো জান্নাতে একজন দুধ-মা রয়েছেন। (২৩৫৫, ৬১৯০) (আধুনিক প্রকাশনীঃ ১২৯১, ইসলামিক ফাউন্ডেশনঃ ১২৯৯)
হাদিস নং: ১৩৮৩
সহিহ (Sahih)
حدثني حبان بن موسى اخبرنا عبد الله اخبرنا شعبة عن ابي بشر عن سعيد بن جبير عن ابن عباس قال سىل رسول الله صلى الله عليه وسلم عن اولاد المشركين فقال الله اذ خلقهم اعلم بما كانوا عاملين
১৩৮৩. ইবনু ‘আব্বাস (রাঃ) হতে বর্ণিত। তিনি বলেন, আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম -কে মুশরিকদের শিশু সন্তানদের সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হলে তিনি বলেনঃ আল্লাহ্ তাদের সৃষ্টি লগ্নেই তাদের ভবিষ্যৎ ‘আমল সম্পর্কে সম্যক জ্ঞাত। (৬৫৯৭, মুসলিম ৪৬/৬, হাঃ ২৬৬০, আহমাদ ১৮৪৫) (আধুনিক প্রকাশনীঃ ১২৯২, ইসলামিক ফাউন্ডেশনঃ ১৩০০)
হাদিস নং: ১৩৮৪
সহিহ (Sahih)
حدثنا ابو اليمان اخبرنا شعيب عن الزهري قال اخبرني عطاء بن يزيد الليثي صلى الله عليه وسلم انه سمع ابا هريرة يقول سىل النبي صلى الله عليه وسلم عن ذراري المشركين فقال الله اعلم بما كانوا عاملين
১৩৮৪. আবূ হুরাইরাহ্ (রাঃ) হতে বর্ণিত। তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম -কে মুশরিকদের নাবালক সন্তান সম্পর্কে জিজ্ঞেস করা হলে বলেনঃ আল্লাহ্ তাদের ভবিষ্যৎ ‘আমল সম্পর্কে সম্যক জ্ঞাত। (৬৫৯৮, ৬৬০০, মুসলিম ৪৬/৭, হাঃ ২৬৫৯, আহমাদ ১০০৯০) (আধুনিক প্রকাশনীঃ ১২৯৩, ইসলামিক ফাউন্ডেশনঃ ১৩০১)
হাদিস নং: ১৩৮৫
সহিহ (Sahih)
حدثنا ادم حدثنا ابن ابي ذىب عن الزهري عن ابي سلمة بن عبد الرحمن عن ابي هريرة قال قال النبي صلى الله عليه وسلم كل مولود يولد على الفطرة فابواه يهودانه او ينصرانه او يمجسانه كمثل البهيمة تنتج البهيمة هل ترى فيها جدعاء
১৩৮৫. আবূ হুরাইরাহ্ (রাঃ) হতে বর্ণিত। তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইরশাদ করেনঃ প্রত্যেক নবজাতক ফিত্রাতের উপর জন্মগ্রহণ করে। অতঃপর তার মাতাপিতা তাকে ইয়াহূদী বা নাসারা অথবা অগ্নি উপাসক করে, যেমন চতুষ্পদ জন্তু একটি পূর্ণাঙ্গ বাচ্চা জন্ম দেয়। তোমরা কি তাকে (জন্মগত) কানকাটা দেখেছ? (১৩৫৮) (আধুনিক প্রকাশনীঃ ১২৯৪, ইসলামিক ফাউন্ডেশনঃ ১৩০২)
হাদিস নং: ১৩৮৬
সহিহ (Sahih)
حدثنا موسى بن اسماعيل حدثنا جرير بن حازم حدثنا ابو رجاء عن سمرة بن جندب قال كان النبي صلى الله عليه وسلم اذا صلى صلاة اقبل علينا بوجهه فقال من راى منكم الليلة رويا قال فان راى احد قصها فيقول ما شاء الله فسالنا يوما فقال هل راى احد منكم رويا قلنا لا قال لكني رايت الليلة رجلين اتياني فاخذا بيدي فاخرجاني الى الارض المقدسة فاذا رجل جالس ورجل قاىم بيده كلوب من حديد قال بعض اصحابنا عن موسى انه يدخل ذلك الكلوب في شدقه حتى يبلغ قفاه ثم يفعل بشدقه الاخر مثل ذلك ويلتىم شدقه هذا فيعود فيصنع مثله قلت ما هذا قالا انطلق فانطلقنا حتى اتينا على رجل مضطجع على قفاه ورجل قاىم على راسه بفهر او صخرة فيشدخ به راسه فاذا ضربه تدهده الحجر فانطلق اليه لياخذه فلا يرجع الى هذا حتى يلتىم راسه وعاد راسه كما هو فعاد اليه فضربه قلت من هذا قالا انطلق فانطلقنا الى ثقب مثل التنور اعلاه ضيق واسفله واسع يتوقد تحته نارا فاذا اقترب ارتفعوا حتى كاد ان يخرجوا فاذا خمدت رجعوا فيها وفيها رجال ونساء عراة فقلت من هذا قالا انطلق فانطلقنا حتى اتينا على نهر من دم فيه رجل قاىم على وسط النهر قال يزيد ووهب بن جرير عن جرير بن حازم وعلى شط النهر رجل بين يديه حجارة فاقبل الرجل الذي في النهر فاذا اراد ان يخرج رمى الرجل بحجر في فيه فرده حيث كان فجعل كلما جاء ليخرج رمى في فيه بحجر فيرجع كما كان فقلت ما هذا قالا انطلق فانطلقنا حتى انتهينا الى روضة خضراء فيها شجرة عظيمة وفي اصلها شيخ وصبيان واذا رجل قريب من الشجرة بين يديه نار يوقدها فصعدا بي في الشجرة وادخلاني دارا لم ار قط احسن منها فيها رجال شيوخ وشباب ونساء وصبيان ثم اخرجاني منها فصعدا بي الشجرة فادخلاني دارا هي احسن وافضل فيها شيوخ وشباب قلت طوفتماني الليلة فاخبراني عما رايت قالا نعم اما الذي رايته يشق شدقه فكذاب يحدث بالكذبة فتحمل عنه حتى تبلغ الافاق فيصنع به الى يوم القيامة والذي رايته يشدخ راسه فرجل علمه الله القران فنام عنه بالليل ولم يعمل فيه بالنهار يفعل به الى يوم القيامة والذي رايته في الثقب فهم الزناة والذي رايته في النهر اكلوا الربا والشيخ في اصل الشجرة ابراهيم عليه السلام والصبيان حوله فاولاد الناس والذي يوقد النار مالك خازن النار والدار الاولى التي دخلت دار عامة المومنين واما هذه الدار فدار الشهداء وانا جبريل وهذا ميكاىيل فارفع راسك فرفعت راسي فاذا فوقي مثل السحاب قالا ذاك منزلك قلت دعاني ادخل منزلي قالا انه بقي لك عمر لم تستكمله فلو استكملت اتيت منزلك
১৩৮৬. সামুরাহ ইবনু জুনদুব (রাঃ) হতে বর্ণিত। তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম (ফজর) সালাত শেষে আমাদের দিকে মুখ ফিরিয়ে বসতেন এবং জিজ্ঞেস করতেন, তোমাদের কেউ গত রাতে কোন স্বপ্ন দেখেছ কি? (বর্ণনাকারী) বলেন, কেউ স্বপ্ন, দেখে থাকলে তিনি তা বিবৃত করতেন। তিনি তখন আল্লাহ্র মর্যী মুতাবিক তাবীর বলতেন। একদা আমাদেরকে প্রশ্ন করলেন, তোমাদের কেউ কি কোন স্বপ্ন দেখেছ? আমরা বললাম, জী না। নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বললেনঃ গত রাতে আমি দেখলাম, দু’জন লোক এসে আমার দু’হাত ধরে আমাকে পবিত্র ভূমির দিকে নিয়ে চললো। হঠাৎ দেখতে পেলাম, এক ব্যক্তি বসে আছে আর এক ব্যক্তি লোহার আঁকড়া হাতে দাঁড়িয়ে। [ইমাম বুখারী (রহ.) বলেন] আমাদের এক সাথী মু‘সা (রহ.) বর্ণনা করেছেন যে, দাঁড়ানো ব্যক্তি বসে থাকা ব্যক্তির (এক পাশের) চোয়ালটা এমনভাবে আঁকড়া বিদ্ধ করছিল যে, তা (চোয়াল বিদীর্ণ করে) মস্তকের পিছনের দিক পর্যন্ত পৌঁছে যাচ্ছিল। অতঃপর অপর চোয়ালটিও আগের মত বিদীর্ণ করল। ততক্ষণে প্রথম চোয়ালটা জোড়া লেগে যাচ্ছিল। আঁকড়াধারী ব্যক্তি পুনরায় সেরূপ করছিল। আমি জিজ্ঞেস করলাম, এ কী হচ্ছে? সাথীদ্বয় বললেন, (পরে বলা হবে এখন) চলুন।
আমরা চলতে চলতে চিৎ হয়ে শায়িত এক ব্যক্তির পাশে এসে উপস্থিত হলাম, তার মাথার নিকট পাথর হাতে এক ব্যক্তি দাঁড়িয়ে পাথর দিয়ে তার মাথা চূর্ণ করে দিচ্ছিল। নিক্ষিপ্ত পাথর দূরে গড়িয়ে যাওয়ার ফলে তা তুলে নিয়ে শায়িত ব্যক্তির নিকট ফিরে আসার পূর্বেই বিচূর্ণ মাথা আগের মত জোড়া লেগে যাচ্ছিল। সে পুনরায় মাথার উপরে পাথর নিক্ষেপ করছিল। আমি জিজ্ঞেস করলাম, লোকটি কে? তাঁরা বললেন, চলুন। আমরা অগ্রসর হয়ে তন্দুরের ন্যায় এক গর্তের নিকট উপস্থিত হলাম। গর্তের উপরিভাগ ছিল সংকীর্ণ ও নীচের অংশ প্রশস্ত এবং এর তলদেশ হতে আগুন জ্বলছিল। আগুন গর্তের মুখের নিকটবর্তী হলে সেখানের লোকগুলোও উপরে চলে আসে যেন তারা গর্ত হতে বের হয়ে যাবে। আগুন ক্ষীণ হয়ে গেলে তারাও (তলদেশে) ফিরে যায়। গর্তের মধ্যে বহুসংখ্যক উলঙ্গ নারী-পুরুষ ছিল। জিজ্ঞেস করলাম, এরা কারা? তাঁরা বললেন, চলুন। আমরা চলতে চলতে একটি রক্ত প্রবাহিত নদীর কাছে হাযির হলাম। নদীর মাঝখানে এক ব্যক্তি দাঁড়ানো ছিল। নদীর তীরে অপর এক ব্যক্তি যার সামনে ছিল পাথর। নদীর মাঝখানের লোকটি নদী হতে বের হয়ে আসার জন্য অগ্রসর হলেই তীরে দাঁড়ানো লোকটি সে ব্যক্তির মুখ বরাবর পাথর নিক্ষেপ করছিল, এতে সে পূর্বস্থানে ফিরিয়ে দিচ্ছিল। এমনভাবে যতবার সে তীরে উঠে আসতে চেষ্টা করে ততবার সে ব্যক্তি তার মুখ বরাবর পাথর নিক্ষেপ করে পূর্বস্থানে ফিরে যেতে বাধ্য করে। আমি জানতে চাইলাম, এ ঘটনার কারণ কী? তাঁরা বললেন, চলতে থাকুন।
আমরা চলতে চলতে একটি সবুজ বাগানে উপস্থিত হলাম। এতে একটি বড় গাছ ছিল। গাছটির গোড়ায় এক বৃদ্ধ ও বেশ কিছু বালক-বালিকা ছিল। হঠাৎ দেখি যে, গাছটির সন্নিকটে জনৈক ব্যক্তি আগুন জ্বালাচ্ছে। সাথীদ্বয় আমাকে নিয়ে গাছে আরোহণ করে এমন একটি বাড়িতে প্রবেশ করলেন যার চেয়ে সুদৃশ্য বাড়ি ইতিপূর্বে কখনো দেখিনি। বাড়িতে বহু সংখ্যক বৃদ্ধ, যুবক, নারী এবং বালক-বালিকা ছিল। অতঃপর তাঁরা আমাকে সেখান হতে বের করে নিয়ে গাছে আরো উপরে আরোহণ করে অপর একটি বাড়িতে প্রবেশ করালেন। এটা পূর্বাপেক্ষা অধিক সুদৃশ্য ও মনোরম। বাড়িটিতে ছিল কতিপয় বৃদ্ধ ও যুবক। আমি বললাম, আজ রাতে আপনারা আমাকে (বহুদূর পর্যন্ত) ভ্রমণ করালেন। এবার বলুন, যা দেখলাম তার তাৎপর্য কী? তাঁরা বললেন, না, আপনি যে ব্যক্তির চোয়াল বিদীর্ণ করার দৃশ্য দেখলেন সে মিথ্যাবাদী; মিথ্যা কথা বলে বেড়াতো, তার বিবৃত মিথ্যা বর্ণনা ক্রমাগত বর্ণিত হয়ে দূর দূরান্তে পৌঁছে যেতো। ক্বিয়ামাত (কিয়ামত) পর্যন্ত তার সঙ্গে এ ব্যবহার করা হবে। আপনি যার মাথা চূর্ণ করতে দেখলেন, সে এমন ব্যক্তি যাকে আল্লাহ্ কুরআনের শিক্ষা দান করেছিলেন, কিন্তু রাতের বেলায় সে কুরআন হতে বিরত হয়ে নিদ্রা যেতো এবং দিনের বেলায় কুরআন অনুযায়ী ‘আমল করতো না। তার সাথে ক্বিয়ামাত (কিয়ামত) পর্যন্ত এরূপই করা হবে। গর্তের মধ্যে যাদেরকে আপনি দেখলেন, তারা ব্যভিচারী। (রক্ত প্রবাহিত) নদীতে আপনি যাকে দেখলেন, সে সুদখোর। গাছের গোড়ায় যে বৃদ্ধ ছিলেন তিনি ইব্রাহীম (আঃ) এবং তাঁর চারপাশের বালক-বালিকারা মানুষের সন্তান। যিনি আগুন জ্বালাচ্ছিলেন তিনি হলেন, জাহান্নামের খাযিন-মালিক নামক ফেরেশ্তা। প্রথম যে বাড়িতে আপনি প্রবেশ করলেন তা সাধারণ মু’মিনদের বাসস্থান। আর এ বাড়িটি হলো শহীদগণের আবাস। আমি (হলাম) জিব্রাঈল আর ইনি হলেন মীকাঈল। (এরপর জিব্রাঈল আমাকে বললেন) আপনার মাথা উপরে উঠান। আমি উঠিয়ে মেঘমালার মত কিছু দেখলাম। তাঁরা বললেন, এটাই হলো আপনার আবাসস্থল। আমি বললাম, আমাকে ছেড়ে দিন আমি আমার আবাসস্থলে প্রবেশ করি। তাঁরা বললেন, এখনো আপনার আয়ু কিছু সময়ের জন্য রয়ে গেছে, যা এখনো পূর্ণ হয়নি। অবশিষ্ট সময় পূর্ণ হলে অবশ্যই আপনি স্বীয় আবাসে চলে আসবেন। (৮৪৫) (আধুনিক প্রকাশনীঃ ১২৯৫, ইসলামিক ফাউন্ডেশনঃ ১৩০৩)
আমরা চলতে চলতে চিৎ হয়ে শায়িত এক ব্যক্তির পাশে এসে উপস্থিত হলাম, তার মাথার নিকট পাথর হাতে এক ব্যক্তি দাঁড়িয়ে পাথর দিয়ে তার মাথা চূর্ণ করে দিচ্ছিল। নিক্ষিপ্ত পাথর দূরে গড়িয়ে যাওয়ার ফলে তা তুলে নিয়ে শায়িত ব্যক্তির নিকট ফিরে আসার পূর্বেই বিচূর্ণ মাথা আগের মত জোড়া লেগে যাচ্ছিল। সে পুনরায় মাথার উপরে পাথর নিক্ষেপ করছিল। আমি জিজ্ঞেস করলাম, লোকটি কে? তাঁরা বললেন, চলুন। আমরা অগ্রসর হয়ে তন্দুরের ন্যায় এক গর্তের নিকট উপস্থিত হলাম। গর্তের উপরিভাগ ছিল সংকীর্ণ ও নীচের অংশ প্রশস্ত এবং এর তলদেশ হতে আগুন জ্বলছিল। আগুন গর্তের মুখের নিকটবর্তী হলে সেখানের লোকগুলোও উপরে চলে আসে যেন তারা গর্ত হতে বের হয়ে যাবে। আগুন ক্ষীণ হয়ে গেলে তারাও (তলদেশে) ফিরে যায়। গর্তের মধ্যে বহুসংখ্যক উলঙ্গ নারী-পুরুষ ছিল। জিজ্ঞেস করলাম, এরা কারা? তাঁরা বললেন, চলুন। আমরা চলতে চলতে একটি রক্ত প্রবাহিত নদীর কাছে হাযির হলাম। নদীর মাঝখানে এক ব্যক্তি দাঁড়ানো ছিল। নদীর তীরে অপর এক ব্যক্তি যার সামনে ছিল পাথর। নদীর মাঝখানের লোকটি নদী হতে বের হয়ে আসার জন্য অগ্রসর হলেই তীরে দাঁড়ানো লোকটি সে ব্যক্তির মুখ বরাবর পাথর নিক্ষেপ করছিল, এতে সে পূর্বস্থানে ফিরিয়ে দিচ্ছিল। এমনভাবে যতবার সে তীরে উঠে আসতে চেষ্টা করে ততবার সে ব্যক্তি তার মুখ বরাবর পাথর নিক্ষেপ করে পূর্বস্থানে ফিরে যেতে বাধ্য করে। আমি জানতে চাইলাম, এ ঘটনার কারণ কী? তাঁরা বললেন, চলতে থাকুন।
আমরা চলতে চলতে একটি সবুজ বাগানে উপস্থিত হলাম। এতে একটি বড় গাছ ছিল। গাছটির গোড়ায় এক বৃদ্ধ ও বেশ কিছু বালক-বালিকা ছিল। হঠাৎ দেখি যে, গাছটির সন্নিকটে জনৈক ব্যক্তি আগুন জ্বালাচ্ছে। সাথীদ্বয় আমাকে নিয়ে গাছে আরোহণ করে এমন একটি বাড়িতে প্রবেশ করলেন যার চেয়ে সুদৃশ্য বাড়ি ইতিপূর্বে কখনো দেখিনি। বাড়িতে বহু সংখ্যক বৃদ্ধ, যুবক, নারী এবং বালক-বালিকা ছিল। অতঃপর তাঁরা আমাকে সেখান হতে বের করে নিয়ে গাছে আরো উপরে আরোহণ করে অপর একটি বাড়িতে প্রবেশ করালেন। এটা পূর্বাপেক্ষা অধিক সুদৃশ্য ও মনোরম। বাড়িটিতে ছিল কতিপয় বৃদ্ধ ও যুবক। আমি বললাম, আজ রাতে আপনারা আমাকে (বহুদূর পর্যন্ত) ভ্রমণ করালেন। এবার বলুন, যা দেখলাম তার তাৎপর্য কী? তাঁরা বললেন, না, আপনি যে ব্যক্তির চোয়াল বিদীর্ণ করার দৃশ্য দেখলেন সে মিথ্যাবাদী; মিথ্যা কথা বলে বেড়াতো, তার বিবৃত মিথ্যা বর্ণনা ক্রমাগত বর্ণিত হয়ে দূর দূরান্তে পৌঁছে যেতো। ক্বিয়ামাত (কিয়ামত) পর্যন্ত তার সঙ্গে এ ব্যবহার করা হবে। আপনি যার মাথা চূর্ণ করতে দেখলেন, সে এমন ব্যক্তি যাকে আল্লাহ্ কুরআনের শিক্ষা দান করেছিলেন, কিন্তু রাতের বেলায় সে কুরআন হতে বিরত হয়ে নিদ্রা যেতো এবং দিনের বেলায় কুরআন অনুযায়ী ‘আমল করতো না। তার সাথে ক্বিয়ামাত (কিয়ামত) পর্যন্ত এরূপই করা হবে। গর্তের মধ্যে যাদেরকে আপনি দেখলেন, তারা ব্যভিচারী। (রক্ত প্রবাহিত) নদীতে আপনি যাকে দেখলেন, সে সুদখোর। গাছের গোড়ায় যে বৃদ্ধ ছিলেন তিনি ইব্রাহীম (আঃ) এবং তাঁর চারপাশের বালক-বালিকারা মানুষের সন্তান। যিনি আগুন জ্বালাচ্ছিলেন তিনি হলেন, জাহান্নামের খাযিন-মালিক নামক ফেরেশ্তা। প্রথম যে বাড়িতে আপনি প্রবেশ করলেন তা সাধারণ মু’মিনদের বাসস্থান। আর এ বাড়িটি হলো শহীদগণের আবাস। আমি (হলাম) জিব্রাঈল আর ইনি হলেন মীকাঈল। (এরপর জিব্রাঈল আমাকে বললেন) আপনার মাথা উপরে উঠান। আমি উঠিয়ে মেঘমালার মত কিছু দেখলাম। তাঁরা বললেন, এটাই হলো আপনার আবাসস্থল। আমি বললাম, আমাকে ছেড়ে দিন আমি আমার আবাসস্থলে প্রবেশ করি। তাঁরা বললেন, এখনো আপনার আয়ু কিছু সময়ের জন্য রয়ে গেছে, যা এখনো পূর্ণ হয়নি। অবশিষ্ট সময় পূর্ণ হলে অবশ্যই আপনি স্বীয় আবাসে চলে আসবেন। (৮৪৫) (আধুনিক প্রকাশনীঃ ১২৯৫, ইসলামিক ফাউন্ডেশনঃ ১৩০৩)
হাদিস নং: ১৩৮৭
সহিহ (Sahih)
حدثنا معلى بن اسد حدثنا وهيب عن هشام عن ابيه عن عاىشة قالت دخلت على ابي بكر فقال في كم كفنتم النبي قالت في ثلاثة اثواب بيض سحولية ليس فيها قميص ولا عمامة وقال لها في اي يوم توفي رسول الله صلى الله عليه وسلم قالت يوم الاثنين قال فاي يوم هذا قالت يوم الاثنين قال ارجو فيما بيني وبين الليل فنظر الى ثوب عليه كان يمرض فيه به ردع من زعفران فقال اغسلوا ثوبي هذا وزيدوا عليه ثوبين فكفنوني فيها قلت ان هذا خلق قال ان الحي احق بالجديد من الميت انما هو للمهلة فلم يتوف حتى امسى من ليلة الثلاثاء ودفن قبل ان يصبح
১৩৮৭. ‘আয়িশাহ্ (রাযি.) হতে বর্ণিত। তিনি বলেন, আমি আবূ বকর (রাঃ)-এর নিকট উপস্থিত হলে তিনি জিজ্ঞেস করলেন, কয় খন্ড কাপড়ে তোমরা নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম -কে কাফন দিয়েছিলে? ‘আয়িশাহ্ (রাযি.) বললেন, তিন খন্ড সাদা সাহুলী (স্থানের নাম) কাপড়ে, যার মধ্যে জামা ও পাগড়ী ছিল না। তিনি আবার জিজ্ঞেস করলেন, কোন্ দিন আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ইনতিকাল করেন? ‘আয়িশাহ্ (রাযি.) বলেন, সোমবার। তিনি জিজ্ঞেস করলেন, আজ কী বার? তিনি (আয়িশাহ (রাযি.) বললেন, আজ সোমবার। তিনি (আবূ বকর (রাঃ) বললেন, আমি আশা করি এখন হতে আগত রাতের মধ্যে (আমার মৃত্যু হবে)। অতঃপর অসুস্থকালীন নিজের পরিধেয় কাপড়ের প্রতি লক্ষ্য করে তাতে জাফরানী রং এর চিহ্ন দেখতে পেয়ে বললেন, আমার এ কাপড়টি ধুয়ে তার সাথে আরো দু’খন্ড কাপড় বৃদ্ধি করে আমার কাফন দিবে। আমি (‘আয়িশাহ) বললাম, এটা (পরিধেয় কাপড়টি) পুরাতন। তিনি বললেন, মৃত ব্যক্তি অপেক্ষা জীবিতদের নতুন কাপড়ের প্রয়োজন অধিক। আর কাফন হলো বিগলিত শবদেহের জন্য। তিনি মঙ্গলবার রাতের সন্ধ্যায় ইন্তিকাল করেন, ভোর হবার পূর্বেই তাঁকে দাফন করা হয়েছিল। (১২৬৪) (আধুনিক প্রকাশনীঃ ১২৯৬, ইসলামিক ফাউন্ডেশনঃ ১৩০৪)
হাদিস নং: ১৩৮৮
সহিহ (Sahih)
حدثنا سعيد بن ابي مريم حدثنا محمد بن جعفر قال اخبرني هشام بن عروة عن ابيه عن عاىشة ان رجلا قال للنبي صلى الله عليه وسلم ان امي افتلتت نفسها واظنها لو تكلمت تصدقت فهل لها اجر ان تصدقت عنها قال نعم
১৩৮৮. ‘আয়িশাহ্ (রাযি.) হতে বর্ণিত। তিনি বলেন, জনৈক ব্যক্তি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম -কে বললেন, আমার মায়ের আকস্মিক মৃত্যু ঘটে, কিন্তু আমার বিশ্বাস তিনি (মৃত্যুর পূর্বে) কথা বলতে সক্ষম হলে কিছু সাদাকা করে যেতেন। এখন আমি তাঁর পক্ষ হতে সাদাকা করলে তিনি এর প্রতিফল পাবেন কি? তিনি [নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ] বললেন, হ্যাঁ। (২৭৬০, মুসলিম ১২/১৫, হাঃ ১০০৪, আহমাদ ২৪৩০৫) (আধুনিক প্রকাশনীঃ ১২৯৭, ইসলামিক ফাউন্ডেশনঃ ১৩০৫)
হাদিস নং: ১৩৮৯
সহিহ (Sahih)
حدثنا اسماعيل حدثني سليمان عن هشام ح و حدثني محمد بن حرب حدثنا ابو مروان يحيى بن ابي زكرياء عن هشام عن عروة عن عاىشة قالت ان كان رسول الله صلى الله عليه وسلم ليتعذر في مرضه اين انا اليوم اين انا غدا استبطاء ليوم عاىشة فلما كان يومي قبضه الله بين سحري ونحري ودفن في بيتي
قَوْلُ اللهِ عَزَّ وَجَلَّ (فَأَقْبَرَهُ) أَقْبَرْتُ الرَّجُلَ أُقْبِرُهُ إِذَا جَعَلْتَ لَهُ قَبْرًا وَقَبَرْتُهُ دَفَنْتُهُ (كِفَاتًا) يَكُونُونَ فِيهَا أَحْيَاءً وَيُدْفَنُونَ فِيهَا أَمْوَاتًا
(আল্লাহ্র বাণী)(فَأَقْبَرَهُ) ‘‘তাকে কবরস্থ করলেন’’- (আবাসাঃ ২১)। أَقْبَرْتُ الرَّجُلَ অর্থাৎ যখন তুমি কারোর জন্য কবর তৈরি করবে। قَبَرْتُهُ অর্থাৎ دَفَنْتُهُ কবরস্থ করা (كِفَاتًا) ^ অর্থাৎ জীবিতাবস্থায় ভূপৃষ্ঠে কবরে ও মৃত্যুর পর এর মধ্যে সমাহিত হবে।
১৩৮৯. ‘আয়িশাহ্ (রাযি.) হতে বর্ণিত। তিনি বলেন, আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রোগশয্যায় (স্ত্রীগণের নিকট অবস্থানের) পালার সময় কাল জানতে চাইতেন। আমার অবস্থান আজ কোথায় হবে? আগামীকাল কোথায় হবে? ‘আয়িশাহ্ (রাযি.)-এর পালা বিলম্বিত হচ্ছে বলে ধারণা করেই এ প্রশ্ন করতেন। [‘আয়িশাহ (রাযি.) বলেন] যে দিন আমার পালা আসলো, সেদিন আল্লাহ্ তাঁকে আমার কণ্ঠদেশ ও বক্ষের মাঝে (হেলান দেয়া অবস্থায়) রূহ্ কবয করলেন [1] এবং আমার ঘরে তাঁকে দাফন করা হয়। (৮৯০) (আধুনিক প্রকাশনীঃ ১২৯৮, ইসলামিক ফাউন্ডেশনঃ ১৩০৬)
(আল্লাহ্র বাণী)(فَأَقْبَرَهُ) ‘‘তাকে কবরস্থ করলেন’’- (আবাসাঃ ২১)। أَقْبَرْتُ الرَّجُلَ অর্থাৎ যখন তুমি কারোর জন্য কবর তৈরি করবে। قَبَرْتُهُ অর্থাৎ دَفَنْتُهُ কবরস্থ করা (كِفَاتًا) ^ অর্থাৎ জীবিতাবস্থায় ভূপৃষ্ঠে কবরে ও মৃত্যুর পর এর মধ্যে সমাহিত হবে।
১৩৮৯. ‘আয়িশাহ্ (রাযি.) হতে বর্ণিত। তিনি বলেন, আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম রোগশয্যায় (স্ত্রীগণের নিকট অবস্থানের) পালার সময় কাল জানতে চাইতেন। আমার অবস্থান আজ কোথায় হবে? আগামীকাল কোথায় হবে? ‘আয়িশাহ্ (রাযি.)-এর পালা বিলম্বিত হচ্ছে বলে ধারণা করেই এ প্রশ্ন করতেন। [‘আয়িশাহ (রাযি.) বলেন] যে দিন আমার পালা আসলো, সেদিন আল্লাহ্ তাঁকে আমার কণ্ঠদেশ ও বক্ষের মাঝে (হেলান দেয়া অবস্থায়) রূহ্ কবয করলেন [1] এবং আমার ঘরে তাঁকে দাফন করা হয়। (৮৯০) (আধুনিক প্রকাশনীঃ ১২৯৮, ইসলামিক ফাউন্ডেশনঃ ১৩০৬)
নোট: [1] যারা স্বামী মারা যাওয়ার সময় স্ত্রীকে ধারে কাছেও যেতে দেন না তাদেরকে এ হাদীস থেকে শিক্ষা নেয়া উচিত।
হাদিস নং: ১৩৯০
সহিহ (Sahih)
حدثنا موسى بن اسماعيل حدثنا ابو عوانة عن هلال هو الوزان عن عروة عن عاىشة قالت قال رسول الله صلى الله عليه وسلم في مرضه الذي لم يقم منه لعن الله اليهود والنصارى اتخذوا قبور انبياىهم مساجد لولا ذلك ابرز قبره غير انه خشي او خشي ان يتخذ مسجدا وعن هلال قال كناني عروة بن الزبير ولم يولد لي حدثنا محمد بن مقاتل اخبرنا عبد الله اخبرنا ابو بكر بن عياش عن سفيان التمار انه
حدثه انه راى قبر النبي صلى الله عليه وسلم مسنما حدثنا فروة
حدثنا علي بن مسهر عن هشام بن عروة عن ابيه لما سقط عليهم الحاىط في زمان الوليد بن عبد الملك اخذوا في بناىه فبدت لهم قدم ففزعوا وظنوا انها قدم النبي صلى الله عليه وسلم فما وجدوا احدا يعلم ذلك حتى قال لهم عروة لا والله ما هي قدم النبي صلى الله عليه وسلم ما هي الا قدم عمر
حدثه انه راى قبر النبي صلى الله عليه وسلم مسنما حدثنا فروة
حدثنا علي بن مسهر عن هشام بن عروة عن ابيه لما سقط عليهم الحاىط في زمان الوليد بن عبد الملك اخذوا في بناىه فبدت لهم قدم ففزعوا وظنوا انها قدم النبي صلى الله عليه وسلم فما وجدوا احدا يعلم ذلك حتى قال لهم عروة لا والله ما هي قدم النبي صلى الله عليه وسلم ما هي الا قدم عمر
১৩৯০. ‘আয়িশাহ্ (রাযি.) হতে বর্ণিত। তিনি বলেন, আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম অন্তিম রোগশয্যায় বলেন, ইয়াহুদী ও নাসারাদের প্রতি আল্লাহ্র অভিসম্পাত বর্ষিত হোক। কারণ, তারা তাদের নবীগণের কবরকে সিজদার স্থানে পরিণত করেছে। (রাবী ‘উরওয়াহ বলেন) এরূপ আশঙ্কা না থাকলে রসুলুল্লাহ্ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম -এর কবরকে (ঘরের বেষ্টনীতে সংরক্ষিত না রেখে) খোলা রাখা হতো। কিন্তু তিনি (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ) আশংকা করেন বা আশঙ্কা করা হয় যে, পরবর্তীতে একে মসজিদে পরিণত করা হবে। রাবী হিলাল (রহ.) বলেন, ‘উরওয়া আমাকে (আবূ আমর) কুনিয়াতে ভূষিত করেন আর তখন পর্যন্ত আমি কোন সন্তানের পিতা হইনি। (আধুনিক প্রকাশনীঃ ১২৯৯, ইসলামিক ফাউন্ডেশনঃ ১৩০৭)
সুফইয়ান তাম্মার (রাঃ) হতে বর্ণিত। তিনি বলেন, তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম -এর কবর উটের কুজের ন্যায় (উঁচু) দেখেছেন। (আধুনিক প্রকাশনীঃ ১৩০০, ইসলামিক ফাউন্ডেশনঃ ১৩০৮)
‘উরওয়াহ (রাঃ) হতে বর্ণিত। তিনি বলেন, ওয়ালীদ ইবনু আবদুল মালিক-এর শাসনামলে যখন (রাসূলুল্লাহ্ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম -এর রাওযার) বেষ্টনী দেয়াল ধসে পড়ে, তখন তাঁরা সংস্কার করতে আরম্ভ করলে একটি পা প্রকাশ পায়, তা আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম -এর কদম মুবারক বলে ধারণা করার কারণে লোকেরা খুব ঘাবড়ে যায়। সনাক্ত করার মত কাউকে তারা পায়নি। অবশেষে ‘উরওয়াহ (রাঃ) তাদের বললেন, আল্লাহ্র কসম এ নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম -এর পা নয় বরং এতো ‘উমার (রাঃ)-এর পা। (৪৩৫) (আধুনিক প্রকাশনীঃ ১৩০১, ইসলামিক ফাউন্ডেশনঃ ১৩০৯)
সুফইয়ান তাম্মার (রাঃ) হতে বর্ণিত। তিনি বলেন, তিনি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম -এর কবর উটের কুজের ন্যায় (উঁচু) দেখেছেন। (আধুনিক প্রকাশনীঃ ১৩০০, ইসলামিক ফাউন্ডেশনঃ ১৩০৮)
‘উরওয়াহ (রাঃ) হতে বর্ণিত। তিনি বলেন, ওয়ালীদ ইবনু আবদুল মালিক-এর শাসনামলে যখন (রাসূলুল্লাহ্ সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম -এর রাওযার) বেষ্টনী দেয়াল ধসে পড়ে, তখন তাঁরা সংস্কার করতে আরম্ভ করলে একটি পা প্রকাশ পায়, তা আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম -এর কদম মুবারক বলে ধারণা করার কারণে লোকেরা খুব ঘাবড়ে যায়। সনাক্ত করার মত কাউকে তারা পায়নি। অবশেষে ‘উরওয়াহ (রাঃ) তাদের বললেন, আল্লাহ্র কসম এ নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম -এর পা নয় বরং এতো ‘উমার (রাঃ)-এর পা। (৪৩৫) (আধুনিক প্রকাশনীঃ ১৩০১, ইসলামিক ফাউন্ডেশনঃ ১৩০৯)
হাদিস নং: ১৩৯১
সহিহ (Sahih)
وعن هشام عن ابيه عن عاىشة انها اوصت عبد الله بن الزبير لا تدفني معهم وادفني مع صواحبي بالبقيع لا ازكى به ابدا
১৩৯১. ‘আয়িশাহ (রাযি.) হতে বর্ণিত যে, তিনি ‘আবদুল্লাহ ইবনু যুবাইর (রাঃ)-কে অসিয়্যত করেছিলেন, আমাকে তাঁদের (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ও তাঁর দু’ সাহাবী) পাশে দাফন করবে না। বরং আমাকে আমার সঙ্গিনীদের সাথে বাকী‘তে দাফন করবে যাতে আমি চিরকালের জন্য প্রশংসিত হতে না থাকি। (৭৩২৭) (আধুনিক প্রকাশনীঃ ১৩০১ শেষাংশ, ইসলামিক ফাউন্ডেশনঃ ১৩০৯)
হাদিস নং: ১৩৯২
সহিহ (Sahih)
حدثنا قتيبة حدثنا جرير بن عبد الحميد حدثنا حصين بن عبد الرحمن عن عمرو بن ميمون الاودي قال رايت عمر بن الخطاب قال يا عبد الله بن عمر اذهب الى ام المومنين عاىشة فقل يقرا عمر بن الخطاب عليك السلام ثم سلها ان ادفن مع صاحبي قالت كنت اريده لنفسي فلا وثرنه اليوم على نفسي فلما اقبل قال له ما لديك قال اذنت لك يا امير المومنين قال ما كان شيء اهم الي من ذلك المضجع فاذا قبضت فاحملوني ثم سلموا ثم قل يستاذن عمر بن الخطاب فان اذنت لي فادفنوني والا فردوني الى مقابر المسلمين اني لا اعلم احدا احق بهذا الامر من هولاء النفر الذين توفي رسول الله صلى الله عليه وسلم وهو عنهم راض فمن استخلفوا بعدي فهو الخليفة فاسمعوا له واطيعوا فسمى عثمان وعليا وطلحة والزبير وعبد الرحمن بن عوف وسعد بن ابي وقاص وولج عليه شاب من الانصار فقال ابشر يا امير المومنين ببشرى الله كان لك من القدم في الاسلام ما قد علمت ثم استخلفت فعدلت ثم الشهادة بعد هذا كله فقال ليتني يا ابن اخي وذلك كفافا لا علي ولا لي اوصي الخليفة من بعدي بالمهاجرين الاولين خيرا ان يعرف لهم حقهم وان يحفظ لهم حرمتهم واوصيه بالانصار خيرا (الذين تبوءوا الدار والايمان) ان يقبل من محسنهم ويعفى عن مسيىهم واوصيه بذمة الله وذمة رسوله ان يوفى لهم بعهدهم وان يقاتل من وراىهم وان لا يكلفوا فوق طاقتهم
১৩৯২. ’আমর ইবনু মায়মুন আওদী (রহ.) হতে বর্ণিত। তিনি বলেন, আমি ’উমার (রাঃ)-কে দেখলাম তিনি নিজের ছেলে ’আবদুল্লাহ্ (রাঃ)-কে ডেকে বললেন, তুমি উম্মুল মু’মিনীন ’আয়িশাহ্ (রাযি.)-এর নিকট গিয়ে বল, ’উমার ইবনুল খাত্তাব (রাঃ) আপনাকে সালাম বলেছেন। অতঃপর আমাকে আমার দু’জন সাথী (নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম ও আবূ বকর)-এর পাশে দাফন করতে তিনি রাযী আছেন কি না? ’আয়িশাহ্ (রাযি.) বললেন, আমি পূর্ব হতেই নিজের জন্য এর আশা পোষণ করতাম, কিন্তু আজ ’উমার (রাঃ)-কে নিজের উপর অগ্রাধিকার দিচ্ছি। ’আবদুল্লাহ্ (রাঃ) ফিরে এলে ’উমার (রাঃ) তাঁকে জিজ্ঞেস করলেন, কি বার্তা নিয়ে এলে? তিনি বললেন, হে আমীরুল মু’মিনীন! তিনি [আয়িশা (রাযি.)] আপনাকে অনুমতি দিয়েছেন। ’উমার (রাঃ) বললেন, সেখানে শয্যা লাভই ছিল আমার নিকট সবচেয়ে গুরুত্বপূর্ণ বিষয়। আমার মৃত্যুর পর আমাকে বহন করে [আয়িশাহ (রাযি.)-এর নিকট উপস্থিত করে] তাঁকে সালাম জানিয়ে বলবে, ’উমার ইবনু খাত্তাব (পুনরায়) আপনার অনুমতি চাইছেন। তিনি অনুমতি দিলে, আমাকে সেখানে দাফন করবে। অন্যথায় আমাকে মুসলিমদের কবরস্থানে ফিরিয়ে নিয়ে আসবে।[1] অতঃপর ’উমার (রাঃ) বলেন, এ কয়েকজন ব্যক্তি যাঁদের উপর আল্লাহর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম মৃত্যু পর্যন্ত সন্তুষ্ট ছিলেন, তাঁদের অপেক্ষা অন্য কাউকে আমি এ খিলাফতের (দায়িত্ব পালনে) অধিক যোগ্য বলে মনে করি না। তাই আমার পর তাঁরা (তাঁদের মধ্য হতে) যাঁকে খালীফা মনোনীত করবেন তিনি খালীফা হবেন।
তোমরা সকলেই তাঁর আদেশ মেনে চলবে, তাঁর আনুগত্য করবে। এ বলে তিনি ’উসমান, ’আলী, তালহা, যুবাইর, ’আবদুর রাহমান ইবনু আওফ ও সা’দ ইবনু আবূ ওয়াক্কাস (রাঃ)-এর নাম উল্লেখ করলেন। এ সময়ে এক আনসারী যুবক ’উমার (রাঃ)-এর নিকট উপস্থিত হয়ে বললো, হে আমীরুল মু’মিনীন! আল্লাহ্ প্রদত্ত সুসংবাদ গ্রহণ করুন। আপনি ইসলামের ছায়াতলে দীর্ঘদিন অতিবাহিত করার সৌভাগ্য লাভ করেছেন যা আপনিও জানেন। অতঃপর আপনাকে খলীফা নিযুক্ত করা হয় এবং আপনি ন্যায়বিচার করেছেন। সর্বোপরি আপনি শাহাদাত লাভ করছেন। ’উমার (রাঃ) বললেন, হে ভাতিজা! যদি তা আমার জন্য লাভ লোকসানের না হয়ে বরাবর হয়, তবে কতই না ভাল হবে। (তিনি বললেন) আমার পরবর্তী খলীফাকে ওয়াসিয়্যাত করে যাচ্ছি, তিনি যেন প্রথম দিকের মুহাজিরদের ব্যাপারে যত্নবান হন, তাঁদের হক আদায় করে চলেন, যেন তাদের যথাযথ সম্মান প্রদর্শন করেন। আমি তাঁকে আনসারদের সাথেও সদাচারের উপদেশ দেই, যারা ঈমান ও মাদ্বীনাকে আঁকড়ে ধরে রয়েছেন, যেন তাঁদের মধ্যকার সৎকর্মপরায়ণদের কাজের স্বীকৃতি প্রদান করা হয় এবং তাঁদের মধ্যকার (লঘু) অপরাধীকে ক্ষমা করে দেয়া হয়। সর্বশেষে আল্লাহ্ ও তাঁর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম -এর দায়িত্বভুক্ত (সর্বস্তরের মু’মিনদের সম্পর্কে) সতর্ক করে দিচ্ছি যেন মু’মিনদের সাথে কৃত অঙ্গীকার পূর্ণ করা হয়, তাদের রক্ষার জন্য যুদ্ধ করা হয় এবং সাধ্যের বাইরে কোন দায়িত্ব তাদের উপর অর্পণ করা না হয়। (৩০৫২, ৩১৬২, ৩৭০০, ৪৮৮৮, ৭২০৭) (আধুনিক প্রকাশনীঃ ১৩০২, ইসলামিক ফাউন্ডেশনঃ ১৩১০)
তোমরা সকলেই তাঁর আদেশ মেনে চলবে, তাঁর আনুগত্য করবে। এ বলে তিনি ’উসমান, ’আলী, তালহা, যুবাইর, ’আবদুর রাহমান ইবনু আওফ ও সা’দ ইবনু আবূ ওয়াক্কাস (রাঃ)-এর নাম উল্লেখ করলেন। এ সময়ে এক আনসারী যুবক ’উমার (রাঃ)-এর নিকট উপস্থিত হয়ে বললো, হে আমীরুল মু’মিনীন! আল্লাহ্ প্রদত্ত সুসংবাদ গ্রহণ করুন। আপনি ইসলামের ছায়াতলে দীর্ঘদিন অতিবাহিত করার সৌভাগ্য লাভ করেছেন যা আপনিও জানেন। অতঃপর আপনাকে খলীফা নিযুক্ত করা হয় এবং আপনি ন্যায়বিচার করেছেন। সর্বোপরি আপনি শাহাদাত লাভ করছেন। ’উমার (রাঃ) বললেন, হে ভাতিজা! যদি তা আমার জন্য লাভ লোকসানের না হয়ে বরাবর হয়, তবে কতই না ভাল হবে। (তিনি বললেন) আমার পরবর্তী খলীফাকে ওয়াসিয়্যাত করে যাচ্ছি, তিনি যেন প্রথম দিকের মুহাজিরদের ব্যাপারে যত্নবান হন, তাঁদের হক আদায় করে চলেন, যেন তাদের যথাযথ সম্মান প্রদর্শন করেন। আমি তাঁকে আনসারদের সাথেও সদাচারের উপদেশ দেই, যারা ঈমান ও মাদ্বীনাকে আঁকড়ে ধরে রয়েছেন, যেন তাঁদের মধ্যকার সৎকর্মপরায়ণদের কাজের স্বীকৃতি প্রদান করা হয় এবং তাঁদের মধ্যকার (লঘু) অপরাধীকে ক্ষমা করে দেয়া হয়। সর্বশেষে আল্লাহ্ ও তাঁর রাসূল সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম -এর দায়িত্বভুক্ত (সর্বস্তরের মু’মিনদের সম্পর্কে) সতর্ক করে দিচ্ছি যেন মু’মিনদের সাথে কৃত অঙ্গীকার পূর্ণ করা হয়, তাদের রক্ষার জন্য যুদ্ধ করা হয় এবং সাধ্যের বাইরে কোন দায়িত্ব তাদের উপর অর্পণ করা না হয়। (৩০৫২, ৩১৬২, ৩৭০০, ৪৮৮৮, ৭২০৭) (আধুনিক প্রকাশনীঃ ১৩০২, ইসলামিক ফাউন্ডেশনঃ ১৩১০)
নোট: [1] তাঁর এ কথাগুলি ক্বিয়ামাত পর্যন্ত আদর্শ হয়ে থাকবে, সুতরাং আমাদের সবাইকে বিশেষ করে শাসক গোষ্ঠীকে এখান থেকে শিক্ষা নেয়া উচিত।
হাদিস নং: ১৩৯৩
সহিহ (Sahih)
حدثنا ادم حدثنا شعبة عن الاعمش عن مجاهد عن عاىشة قالت قال النبي صلى الله عليه وسلم لا تسبوا الاموات فانهم قد افضوا الى ما قدموا ورواه عبد الله بن عبد القدوس عن الاعمش ومحمد بن انس عن الاعمش تابعه علي بن الجعد وابن عرعرة وابن ابي عدي عن شعبة
১৩৯৩. ‘আয়িশাহ্ (রাযি.) হতে বর্ণিত। তিনি বলেন, নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম বলেছেনঃ তোমরা মৃতদের গালি দিও না। কারণ, তারা স্বীয় কর্মফল পর্যন্ত পৌঁছে গেছে। [ইমাম বুখারী (রহ.) বলেন] ‘আবদুল্লাহ ইবনু ‘আবদুল কুদ্দুস ও মুহাম্মাদ ইবনু আনাস (রহ.) আ‘মাশ (রহ.) হতে হাদীসটি বর্ণনা করেছেন। ‘আলী ইবনু জা‘দ, ইবনু আর‘আরা ও ইবনু আবূ ‘আদী (রহ.) শু‘বাহ (রহ.) হতে হাদীস বর্ণনায় আদম (রহ.)-এর অনুসরণ করেছেন। (৬৫১৬) (আধুনিক প্রকাশনীঃ ১৩০৩, ইসলামিক ফাউন্ডেশনঃ ১৩১১)
হাদিস নং: ১৩৯৪
সহিহ (Sahih)
حدثنا عمر بن حفص حدثنا ابي حدثنا الاعمش حدثني عمرو بن مرة عن سعيد بن جبير عن ابن عباس قال قال ابو لهب عليه لعنة الله للنبي تبا لك ساىر اليوم فنزلت (تبت يدا ابي لهب وتب) (المسد : 1)
১৩৯৪. ইবনু ’আব্বাস (রাঃ) হতে বর্ণিত। তিনি বলেন, আবূ লাহাব লানাতুল্লাহি ’আলাইহি নবী সাল্লাল্লাহু আলাইহি ওয়াসাল্লাম -কে লক্ষ্য করে বললো, সারা দিনের জন্য তোমার অনিষ্ট হোক! (তার এ কথার পরিপ্রেক্ষিতে) নাযিল হয়ঃ (যার অর্থ) ’’আবূ লাহাবের হাত দু’টো ধ্বংস হোক এবং সেও ধ্বংস হোক’’- (আল-মাসাদঃ ১)। (৩৫২৫, ৩৫২৬, ৪৭৭০, ৪৮০১, ৪৯৭১, ৪৯৭২, ৪৯৭৩, মুসলিম ১/৮৯, হাঃ ২০৮, আহমাদ ২৮০২) (আধুনিক প্রকাশনীঃ ১৩০৪, ইসলামিক ফাউন্ডেশনঃ ১৩১২)*
নোট: *মানুষ মৃত্যুর দুয়ারে উপনীত হলে বা তার মৃত্যুর পর তার রূহ, জানাযা ও কবরকে ঘিরে বিভিন্নমুখী নাজায়িয ও বিদ‘আতী কার্যকলাপ মুসলিমদের অজ্ঞতা ও বাড়াবাড়ির কারণে সমাজে চালু হয়ে গেছে। বিশ্ববিখ্যাত মুহাদ্দিস নাসিরুদ্দীন আলবানী তাঁর প্রণীত কিতাব “আহকামুল জানায়িয”-এ এ রকম ২৪১টি বিদ‘আতের কথা উল্লেখ করেছেন। আমাদেরকে অবশ্যই এ সব বিদ‘আত থেকে বেঁচে থাকতে হবে। পাঠকগণ মূল কিতাবটি সংগ্রহ করে জেনে নিবেন। এখানে কয়েকটি উল্লেখ করা হলো :
(১) মরণাপন্ন ব্যক্তির পাশে বা মৃতের পাশে বা তার কবরের পাশে বা অন্য জায়গায় তাকে সওয়াব পৌঁছানোর আশায়, সূরা ইয়াসিন বা সূরা ফাতিহা বা সূরা ইখলাস বা কূরআনের যে কোন সূরা পাঠ করা বা তাসবীহ পাঠ করা বা কুরআন খতম করা। (২) কাফনে দু‘আ লেখা। (৩) জানাযাকে সুসজ্জিত করা। (৪) যিক্র, কুরআন তিলাওয়াতের দ্বারা উচ্চ আওয়াজ করা। (৫) উপস্থিত লোকদের নিকট হতে মৃতের প্রশংসাগীতি আদায় করা। (৬) মাটি প্রথম নিক্ষেপে ‘মিনহা খালাকনাকুম, ২য় নিক্ষেপে ওয়া ফীহা নু‘য়ীদুকুম এবং ৩য় নিক্ষেপে ওয়া মিনহা ..... উখরা’ পড়া। (৭) কবরের পাশে বা অন্য কোন স্থানে শোক পালনের জন্য একত্রিত হওয়া বা শোক প্রকাশ করা। (৮) মৃতের পরিবারের পক্ষ থেকে আপ্যায়নের ব্যবস্থা করা। (৯) মৃতের জন্য প্রথম দিনে বা তৃতীয় দিনে বা সপ্তম দিনে বা চল্লিশতম দিনে বা বর্ষপূর্তিতে আপ্যায়নের ব্যবস্থা করে সিওম, কুলখানী, চল্লিশা বা মৃত্যুবার্ষিকী অনুষ্ঠান পালন করা। (১০) নেকী পৌঁছানোর উদ্দেশ্যে মৃত্যুর পূর্বে ভোজন বা মেহমানদারীর জন্য, কুরআন তিলাওয়াত, তাসবীহ তাহলীল, নফল সালাত, ইসতিগফার ও নাবী সল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর প্রতি দরূদ পড়ার জন্য টাকা-পয়সা ওয়াক্ফ করা বরাদ্দ করা। (১১) নির্দিষ্ট করে মৃত্যুর তিনদিন পর এবং সপ্তাহের প্রথমে অতঃপর ১৫তম দিনে ও চল্লিশতম দিনে বা প্রতি জুমু‘আর দিনে বা আশুরার দিনে বা শা’বানের ১৫ তারিখে বা দুই ঈদের দিনে কবর যিয়ারত করা। (১২) সালাতের মত দু’হাত বেঁধে কবরের সামনে দাঁড়িয়ে থাকা, অতঃপর বসা। (১৩) দু‘আ কবুল হবে এ আশায় দু‘আ করার জন্য কবরস্থানে গমন করা। (১৪) কবরে শায়িত ব্যক্তির মাধ্যমে বা অসীলায় আল্লাহর নিকট সাহায্য চাওয়া। (১৫) নাবী ও সৎ লোকদের কবর যিয়ারত করার জন্য সফর করা। (১৬) কবরে মাসজিদ নির্মাণ করা বা দেয়াল, খুঁটি, ঘর বা সেতু নির্মাণ করা বা সুসজ্জিত করা। (১৭) কবরকে স্পর্শ করা, চুমু দেয়া, পেট ও পিঠ লাগানো বা কবরের ধূলাবালি গালে লাগানো। (১৮) যিক্র, সালাত, সিয়াম বা জবেহ্ করার জন্য কবরে যাওয়ার মনস্থ করা। (১৯) কবরের সম্মান বা সেবা করার জন্য কবরে অবস্থান করা। (২০) আল্লাহ ছাড়া রসূলের কাছে সাহায্য চাওয়া। (২১) নাবী (‘আ.) ও পরহেযগার ব্যক্তিবর্গের কবর মাসাহ করা, তাওয়াফ করা, চুমু দেয়া এবং পেট ও পিঠ লাগানো। (২২) মৃতের নখ কাটা ও গুপ্তাঙ্গের চুল কাটা। (২৩) নাপাকী না থাকা সত্ত্বে জানাযার সালাতে জুতা খুলে দাঁড়ানো।
(১) মরণাপন্ন ব্যক্তির পাশে বা মৃতের পাশে বা তার কবরের পাশে বা অন্য জায়গায় তাকে সওয়াব পৌঁছানোর আশায়, সূরা ইয়াসিন বা সূরা ফাতিহা বা সূরা ইখলাস বা কূরআনের যে কোন সূরা পাঠ করা বা তাসবীহ পাঠ করা বা কুরআন খতম করা। (২) কাফনে দু‘আ লেখা। (৩) জানাযাকে সুসজ্জিত করা। (৪) যিক্র, কুরআন তিলাওয়াতের দ্বারা উচ্চ আওয়াজ করা। (৫) উপস্থিত লোকদের নিকট হতে মৃতের প্রশংসাগীতি আদায় করা। (৬) মাটি প্রথম নিক্ষেপে ‘মিনহা খালাকনাকুম, ২য় নিক্ষেপে ওয়া ফীহা নু‘য়ীদুকুম এবং ৩য় নিক্ষেপে ওয়া মিনহা ..... উখরা’ পড়া। (৭) কবরের পাশে বা অন্য কোন স্থানে শোক পালনের জন্য একত্রিত হওয়া বা শোক প্রকাশ করা। (৮) মৃতের পরিবারের পক্ষ থেকে আপ্যায়নের ব্যবস্থা করা। (৯) মৃতের জন্য প্রথম দিনে বা তৃতীয় দিনে বা সপ্তম দিনে বা চল্লিশতম দিনে বা বর্ষপূর্তিতে আপ্যায়নের ব্যবস্থা করে সিওম, কুলখানী, চল্লিশা বা মৃত্যুবার্ষিকী অনুষ্ঠান পালন করা। (১০) নেকী পৌঁছানোর উদ্দেশ্যে মৃত্যুর পূর্বে ভোজন বা মেহমানদারীর জন্য, কুরআন তিলাওয়াত, তাসবীহ তাহলীল, নফল সালাত, ইসতিগফার ও নাবী সল্লাল্লাহু ‘আলাইহি ওয়াসাল্লাম-এর প্রতি দরূদ পড়ার জন্য টাকা-পয়সা ওয়াক্ফ করা বরাদ্দ করা। (১১) নির্দিষ্ট করে মৃত্যুর তিনদিন পর এবং সপ্তাহের প্রথমে অতঃপর ১৫তম দিনে ও চল্লিশতম দিনে বা প্রতি জুমু‘আর দিনে বা আশুরার দিনে বা শা’বানের ১৫ তারিখে বা দুই ঈদের দিনে কবর যিয়ারত করা। (১২) সালাতের মত দু’হাত বেঁধে কবরের সামনে দাঁড়িয়ে থাকা, অতঃপর বসা। (১৩) দু‘আ কবুল হবে এ আশায় দু‘আ করার জন্য কবরস্থানে গমন করা। (১৪) কবরে শায়িত ব্যক্তির মাধ্যমে বা অসীলায় আল্লাহর নিকট সাহায্য চাওয়া। (১৫) নাবী ও সৎ লোকদের কবর যিয়ারত করার জন্য সফর করা। (১৬) কবরে মাসজিদ নির্মাণ করা বা দেয়াল, খুঁটি, ঘর বা সেতু নির্মাণ করা বা সুসজ্জিত করা। (১৭) কবরকে স্পর্শ করা, চুমু দেয়া, পেট ও পিঠ লাগানো বা কবরের ধূলাবালি গালে লাগানো। (১৮) যিক্র, সালাত, সিয়াম বা জবেহ্ করার জন্য কবরে যাওয়ার মনস্থ করা। (১৯) কবরের সম্মান বা সেবা করার জন্য কবরে অবস্থান করা। (২০) আল্লাহ ছাড়া রসূলের কাছে সাহায্য চাওয়া। (২১) নাবী (‘আ.) ও পরহেযগার ব্যক্তিবর্গের কবর মাসাহ করা, তাওয়াফ করা, চুমু দেয়া এবং পেট ও পিঠ লাগানো। (২২) মৃতের নখ কাটা ও গুপ্তাঙ্গের চুল কাটা। (২৩) নাপাকী না থাকা সত্ত্বে জানাযার সালাতে জুতা খুলে দাঁড়ানো।